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निर्भया का असली नाम बोलने और लिखने में क्या परेशानी है!

निर्भया के माता-पिता का मानना है कि मुंह वे छिपाएं जिन्होंने यह घिनौना काम किया है, पीड़ित या उनके परिवार ऐसा क्यों करें! लेकिन क्या बात इतनी सीधी है?
निर्भया कांड के किशोर दोषी की हालिया रिहाई के चलते यह मामला इन दिनों एक बार फिर से सुर्ख़ियों में है. देश भर के लोगों में इस रिहाई को लेकर लगभग वैसा ही आक्रोश है जैसा 16 दिसंबर 2012 की इस घटना के वक्त था. महिला सुरक्षा और किशोर अपराधियों से जुड़े जो सवाल उन दिनों सारे देश की सुर्ख़ियों में छाए थे, वही सवाल एक बार फिर से उठने लगे हैं.
इनमें एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या बलात्कार पीड़ितों की पहचान उजागर होनी चाहिए. यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि हाल ही में निर्भया की मां आशा देवी ने अपनी बेटी का असली नाम सार्वजनिक किया है. उनका कहना था, 'मेरी बेटी का नाम ज्योति सिंह है और मुझे उसका नाम उजागर करने में ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं है.' 2012 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने मांग की थी कि बलात्कार से संबंधित जो नए कानून बनाए जा रहे हैं उन्हें इस बहादुर लडकी के नाम पर बनाया जाना चाहिए. निर्भया का असली नाम उजागर करने की बात 2012 में भी उठी थी. उस वक्त तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने इसकी मांग की थी. उनका कहना था कि बलात्कार से संबंधित जो नए कानून बनाए जा रहे हैं उन्हें इस बहादुर लडकी के नाम पर बनाया जाना चाहिए. ज्योति के माता-पिता के साथ ही किरण बेदी और अनुपम खेर जैसे बड़े नामों ने भी तब शशि थरूर के इस बयान का समर्थन किया था. लेकिन इसके बाद भी निर्भया का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया था. इसलिए उसके साथ हुए अपराध के बाद जो नए कानून बने और बलात्कार पीड़ितों के लिए जो वित्तीय योजना शुरू की गई, उन्हें निर्भया नाम से ही जाना जाता है.
कानून
ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि बलात्कार पीड़ितों का नाम सार्वजनिक करना एक अपराध है. भारतीय दंड संहिता की धारा 228ए के तहत ऐसा करने वालों को दो साल तक की सजा का प्रावधान है. 2012 में जब नए कानून को निर्भया के असली नाम पर बनाने की मांग हो रही थी तो केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह भी कहा था कि 'किसी व्यक्ति के नाम पर कानून बनाए जाने का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है.' लेकिन निर्भया के वास्तविक नाम पर कानून बनाए जाने की मांग कर रहे लोगों का तर्क था कि यह प्रावधान यदि मौजूद नहीं भी है तो आसानी से बनाया जा सकता है. रंगा-बिल्ला मामले के पीड़ित गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के नाम पर बहादुरी पुरस्कार दिया जाता है. इनका उदाहरण देते हुए लोगों ने मांग की थी कि ज्योति के नाम पर भी नए कानून बनाए जा सकते हैं. 'यह सवाल सिर्फ निर्भया तक ही सीमित नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर करने के क्या प्रभाव हो सकते हैं?' लेकिन कानून के कई दिग्गजों ने उस वक्त भी इस मांग का समर्थन नहीं किया था. दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर का तब कहना था, 'यह सवाल सिर्फ निर्भया तक ही सीमित नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर करने के क्या प्रभाव हो सकते हैं? दिल्ली का यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित हो चुका है इसलिए लोगों की सहानुभूति पीड़ित और उसके परिजनों के साथ है. लेकिन बलात्कार के मामलों में आज भी समाज पीड़ित को एक आम नागरिक की तरह नहीं स्वीकार करता. इसलिए उसकी पहचान उजागर करने की प्रथा शुरू नहीं होनी चाहिए.'

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