लॉकडाउन में भूख से नहीं हो रही मौत, तो सुशासन बाबू के राज में सिर्फ गरीब क्यों मर रहे हैं !
लॉकडाउन में तीन गरीब बच्चों की असामयिक मौत और एक शख्स की आत्महत्या में बिहार की सुशासन सरकार ‘भूख’ का दोष’ मानने को तैयार नहीं है। नीतीश सरकार को हर तरफ राशन सहज मिलता दिख रहा है, जबकि इन चारों के घरों में अनाज का एक दाना नहीं मिलना हकीकत बयां कर देता है।
बिहार के लखीसराय के कबैया थाना क्षेत्र के वार्ड-32 में 45 साल के महेश राम ने 11 अप्रैल की दोपहर में फांसी पर लटककर अपनी जान दे दी। कबैया रोड में पसिया टोला चौक पर उसकी चाय की दुकान लॉकडाउन के कारण कई रोज से बंद थी। इसी चाय दुकान की कमाई से पत्नी, पांच बेटों और दो बेटियों वाले उसके परिवार का दाना-पानी चलता था। उसके घर के खाली बर्तन और शांत चूल्हा देखकर यह साफ पता चल रहा है कि परिवार आर्थिक तंगी में है। वार्ड-32 के पार्षद ने स्वीकार किया कि उन्हें उसकी आर्थिक तंगी की जानकारी ही नहीं थी, इसलिए समय पर वह मदद नहीं कर सके।
लेकिन दूसरी तरफ इलाके के एसडीओ मुरली प्रसाद सिंह ने घटना के पीछे आपसी विवाद की आशंका जताई है। अब पेट खाली हो, परिवार का बच्चा-बच्चा भूखा हो, कमाई नहीं हो और अनाज का दाना भी कोई न दे और घर में खाने को लेकर रोज बरतन पटका-पटकी हो तो आपसी विवाद की सरकारी दलील नीतीश कुमार की सरकार में ही संभव है।
खाली पेट रातभर बिलबिलाता रहा, सुबह इलाज बिना मौत
भागलपुर से देवघर की ओर निकलें तो बांका जिले का बाराहाट प्रखंड आता है। यहां के लौढ़िया खुर्द पंचायत के दुबराजपुर गांव में 10 अप्रैल की सुबह 12 साल के राकेश की मौत हो जाती है। नाना की झोपड़ी में रह रहे राकेश को 9 अप्रैल को दिन में भी पेट भरने लायक कुछ नहीं मिला था। मछली मारने के लिए गया, वह भी नसीब नहीं हुई। शाम में भूख से परेशान था। फिर पेट दर्द से कराहने लगा। राकेश के नाना महावीर लैया मजदूरी से ही परिवार का पेट भरता था। लॉकडाउन के बाद से काम मिलना बंद था। दवा के पैसे कहां से आते? सुबह तक इंतजार किया, फिर पंजवारा स्थित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पहुंचा, मगर बदकिस्मती साथ थी। डॉक्टर मिले, न नर्स। किसी तरह पैसा जुटाकर पेट दर्द की गोली खरीद नाना लौटे, मगर तब तक राकेश की मौत हो चुकी थी। सरकारी तंत्र ने इसे अस्वाभाविक मौत माना, लेकिन भूख से मौत न निकल जाए, इसलिए जांच नहीं की।
दो दिन भूख के बाद सरकारी दावों के कफन में लिपटा राकेश
आरा में मुसहर जाति के 8 साल के बच्चे राकेश की 26 मार्च को मौत हो गई। इस जाति के लोग हर दिन मजदूरी कर लौटते वक्त अगले दिन का अनाज लाकर काम चलाते हैं। आठ साल का राकेश कबाड़ जुटा-बेचकर कुछ पैसे लाता था। पिता दुर्गा मुसहर माल-ढुलाई का काम कर पैसे लाता था, लेकिन जनता कर्फ्यू के पहले से ही काम मिलना बंद था। हालत यह थी कि 24 मार्च से उसके घर चूल्हा ही नहीं जला था। जन-जन तक राशन पहुंचाने के लिए की गई सरकारी घोषणा इसके घर तक पहुंचती, तब तक बुखार-दस्त ने राकेश की शक्ति छीन ली।
राकेश की मां सोनमती का कहना था कि 22 मार्च से काम नहीं मिल रहा था। किसी तरह 24 की रात तक खाना बना। उसी रात राकेश ने अंतिम रोटी खाई थी। 26 को उसे सदर अस्पताल में दवा लिखी गई। किसी तरह पैसे जुटाकर दवा खरीदा, मगर उसे खाने से पहले वह सरकार के तमाम दावों के कफन में लिपटकर चला गया।

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