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जीवनसंगिनी को हिन्दू धर्म में क्यों कहते हैं धर्मपत्नी? जानें इसका महत्त्व!


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हिंदू धर्म में पत्नी को पति की अर्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी पति के शरीर का आधा अंग होती है। महाभारत में भीष्म पितामाह ने कहा है कि पत्नी को हमेशा खुश रखना चाहिए क्योंकि उसी से वंश की वृद्धि होती है। पत्नी गृहलक्ष्मी होती है यानी पत्नी के खुश और सुखी रहने पर घर में बरकत तो होती ही है साथ ही पैसा भी आता रहता है। कुछ खास गुणों के कारण पत्नी को घर की लक्ष्मी कहा जाता है। समाज में कई लोग ऐसे भी हैं जो अपनी पार्टनर भी कहते हैं। शायद वो मजाक में ऐसा कहते है, मगर इसके पीछे भी एक वजह है। क्योंकि कानून के कारण पत्नी अपने पति की आय और संपत्ति में भागीदार होती है। ये सभी बातें तो ठीक है, लेकिन आखिरकार पत्नी को धर्मपत्नी क्यों कहा जाता है। इसके पीछे भी कोई लॉजिक है या समाज में पत्नी का मान सम्मान बढ़ाने के लिए उसको धर्मपत्नी कहकर पुकारा जाता है, आइये जानें।
पत्नी शब्द का अर्थ
पत्नी शब्द के बारे में जानने के लिए आपको 5000 साल पीछे जाना पड़ेगा। पहले के वक्त में समाज की कई जातियों में एक पुरुष और स्त्री को अकेले में मिलने की अनुमति थी जिसको आज के इस नए युग में 'डेट' के नाम से पहचाना जाता है। तब कई समाज ऐसे भी थे जहां पर स्त्री और पुरुष शादी किए बिना ही एकसाथ में रह सकते थे । जिसको आप सभी लोग 'लिव इन रिलेशन' के नाम से पहचानते हैं। इस रिश्तो को जब मित्रों से मिलवाने का होता है तो लोग इसे 'लिव-इन-पार्टनर' के नाम से संबोधित करते हैं। राजा महाराजा, समाज के मुखिया और धनवान या प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा राजनीति और कूटनीति के कारण से दूसरे राजा या तो समकक्ष के परिवार की महिला के साथ शादी की जाती थी और पहले के दौर में एक व्यक्ति कई महिलाओं के साथ शादी के बंधन में बंधता था और वो सभी महिलाएं उसकी पत्नी कहलाती थी। इसके साथ ही साथ कई तरह की शादियां होती थीं और ये सभी शदियां लगभग एक तरह का अनुबंध होते थे।किसी अनुबंध में बंध कर आपके जीवन में आयी महिला 'पत्नी' कहलाती है।
धर्मपत्नी शब्द का अर्थ

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पत्नी जिन्हें हम जीवनसंगिनी, जीवनसाथी, धर्मपत्नी जैसे नामों से जानते हैं, हमारे जीवन का एक अनमोल हिस्सा होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तकरीबन 99% शादीशुदा पुरुषों को ये नहीं पता कि पत्नी को धर्म पत्नी क्यों कहा जाता है ।जैसा की हमने आपको ऊपर बताया कि पुराने जमाने में पुरुष एक से अधिक महिलाओं से शादी किया करते थे। उन सभी महिलाओं में सिर्फ उसी पत्नी को धर्मपत्नी का सम्मान मिलता था जिसके यज्ञ वेदी के सामने बैठ कर , अग्नि को साक्षी मानकर विवाह का संस्कार पूर्ण करता है । हिंदू धर्म में हर कर्म के लिए एक संस्कार होता है और जन्म से मरण तक ऐसे 16 संस्कार हैं - जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, आदि। इसी प्रकार मनुष्य जिस महिला के साथ शादी का संस्कार निभाता है उसी को धर्मपत्नी का दर्जा दिया जाता है। जबकि राजनैतिक, व्यवसायिक या व्यक्तिगत लाभ के लिए किए गए विवाह के कारण जीवनसंगिनी बनी महिला पत्नी कहलाती है धर्मपत्नी नहीं। देने वाली बात हैं कि धर्मपत्नी के अधिकार भी पत्नी से अलग होते हैं , जैसे जब भी कोई सामाजिक या धार्मिक आयोजन हो तो उसमें धर्मपत्नी ही पति के साथ बैठ सकती है। यदि पिता की मृत्यु होती है तो धर्मपत्नी का पुत्र ही पिता को मुखाग्नि देता है। कम शब्दों में कहें तो जिस पत्नी को धार्मिक मान्यता प्राप्त है वही धर्मपत्नी है। क्योंकि आजकल एक पत्नी वाद है इसलिए पत्नी को धर्मपत्नी कहा जाता है।

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